सोमेश्वर शिव महापुराण में उमड़ी भक्तों की भीड़, सुमित महाराज ने सुनाया ‘नारद मोह’ और ‘भगवान विष्णु को श्राप’ का रोचक प्रसंग
कवर्धा खबर योद्धा ।। नगर के वार्ड क्रमांक 14 स्थित परमेश्वरी मंदिर के पास आयोजित ‘श्री सोमेश्वर शिव महापुराण’ कथा में इन दिनों भक्ति की अविरल गंगा बह रही है। 6 जून से 10 जून तक चलने वाले इस भव्य पांच दिवसीय पावन आयोजन में भगवान शिव की महिमा सुनने के लिए प्रतिदिन शिवभक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है।

महापुराण के दूसरे दिन व्यासपीठ पर विराजमान प्रसिद्ध कथावाचक आचार्य श्री सुमित भारद्वाज (महाराज) ने विद्यवेश्वर संहिता और कुबेर चरित्र का संगीतमय वर्णन किया। इसके साथ ही उन्होंने देवर्षि नारद के अहंकार और भगवान विष्णु को उनके द्वारा दिए गए श्राप का अत्यंत रोचक एवं शिक्षाप्रद प्रसंग सुनाया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए।
कामदेव पर विजय और नारद जी का अहंकार
श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए सुमित महाराज ने बताया कि एक बार देवर्षि नारद हिमालय की एक पवित्र गुफा में घोर तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या से घबराकर देवराज इंद्र ने कामदेव को भेजा, लेकिन नारद जी अडिग रहे। कामदेव पर विजय प्राप्त करने के बाद नारद जी के मन में यह अहंकार आ गया कि उन्होंने वासना (काम) को जीत लिया है। उन्होंने अपनी इस विजय का बखान भगवान शिव और भगवान विष्णु के समक्ष किया।
विष्णु जी की माया और नारद जी का मोह
महाराज जी ने आगे बताया कि नारद जी के इसी अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान विष्णु ने अपनी माया रची। उन्होंने एक अत्यंत सुंदर नगर और ‘विश्वमोहिनी’ नामक रूपवती राजकुमारी का निर्माण किया। नारद जी उस राजकुमारी को देखते ही अपनी सारी तपस्या भूल बैठे और विवाह की इच्छा से उन्होंने भगवान विष्णु से उनका ‘हरि’ (सुंदर) रूप मांग लिया। भगवान ने उन्हें रूप तो दिया, लेकिन मुख एक वानर (बंदर) का लगा दिया।
स्वयंवर में क्रोध और विष्णु जी को श्राप
स्वयंवर में राजकुमारी ने वानर मुख वाले नारद जी को अनदेखा कर दिया और वहां पहुंचे भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। जब नारद जी को सच्चाई का पता चला, तो उन्होंने अत्यंत क्रोधित होकर भगवान विष्णु को श्राप दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह वे स्त्री वियोग में तड़प रहे हैं, वैसे ही विष्णु जी को भी धरती पर मानव रूप में अवतरित होकर पत्नी का वियोग सहना पड़ेगा और वानरों की ही सहायता लेनी पड़ेगी। सुमित महाराज ने बताया कि देवर्षि नारद का यही श्राप आगे चलकर भगवान के ‘श्री राम अवतार’ और रामायण की कथा का मुख्य कारण बना।
कथा के अंत में सुमित महाराज ने संदेश दिया कि जीवन में अहंकार हमेशा पतन का कारण बनता है, चाहे वह तपस्या का ही क्यों न हो। इस दौरान पूरा कथा पंडाल ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठा।


