नन्हे हाथों में पीला सोना और चेहरे पर मुस्कान
पेड़ से टपक रहा पीला सोना, महुआ की खुशबू से महका वनांचल

कवर्धा खबर योद्धा ।। भोरमदेव , चिल्फी, सरोधा ,बदौरा ,सहित पंडरिया के वनांचल क्षेत्रों में महुआ की खुशबू बिखरने लगी है । यह पिला सोना आदिवासियों की जीवन में आर्थिक मजबूती लाता है ।
वैसे तो कबीरधाम जिले के जंगलों में मिलने वाले महुआ, चिरौटा (कसांदी), साल (सरई) के बीज, इमली, और आंवला जैसे प्रमुख वनोपज आदिवासियों की आर्थिक मदद का मुख्य जरिया है ।

यहां के आदिवासियों के लिए यह उनके साल भर के वजूद की पूंजी है। तपते पारे के बीच गिरता महुआ का एक-एक फूल आदिवसियों के लिए पीला सोना है, जो उनको आर्थिक रूप से मजबूत करता है ।
सूरज की पहली किरण से पहले लग जाते है काम पर
जब सूरज की पहली किरण भी धरती को नहीं छूती, तब वनांचलों में टॉर्च की मद्धम (कम) रोशनी और टोकरियों में महुआ के फूल महकने लगते हैं। यहां के वनांचल वासियों के लिए यह उनके साल भर के वजूद की पूंजी है। तपते पारे के बीच गिरता महुआ का एक-एक फूल आदिवसियों के लिए पीला सोना है, जो उनके सूने पड़े खींसों (जेब) में खनक पैदा करता है।
भोर की नींद और पसीने का सौदा तब मिलती है खनक
जिले में लगातार तापमान दिन ब दिन बढ़ते जा रहा है , लेकिन यह गर्मी वनांचल वासियों के इरादों को हिला नहीं पा रही।
चिल्फी जैसे दूरस्थ अंचलों में आलम यह है कि परिवार का हर सदस्य—चाहे वह नन्हे हाथों वाला बच्चा हो या झुर्रियों भरे चेहरे वाला बुजुर्ग—सुबह 4 बजे ही जंगलों की ओर दौड़ पड़ता है। सुबह की नींद का त्याग कर ये ग्रामीण महुआ के पेड़ों के नीचे अपनी किस्मत बीनते हैं। महुआ का गिरना यहां महज एक प्राकृतिक चक्र नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का( आय का बढ़ा साधन ) प्राइमरी रेवेन्यू सोर्स है। यह वह नगद है, जो साहूकारों के कर्ज से मुक्ति और घर के राशन का इंतजाम करती है।
प्रकृति और पसीने की गजब की जुगलबंदी
ग्रामीणों के अनुसार, जितनी अधिक गर्मी पड़ती है, महुआ का फूल उतना ही अधिक झड़ता है। आसमान से बरसती आग उनके लिए वरदान बन जाती है। महुआ बीनने से पहले पेड़ों के नीचे की जमीन को जिस करीने से साफ किया जाता है, वह उनके काम के प्रति समर्पण को दर्शाता है। वे सुनिश्चित करते हैं कि पीला सोना मिट्टी में मिलकर अपनी चमक न खो दे। वह सुबह 4 बजे से जंगल की ओर रुख कर जाते हैं।
उम्मीदों की चमक और संघर्ष की एक कहानी
जंगलों के सन्नाटे में जब नवप्रदेश की टीम ने इन ग्रामीणों से संवाद किया, तो उनकी बातों में थकान से ज्यादा उम्मीद दिखी। उनके लिए महुआ का झडऩा मानो आर्थिक मजबूती हो। यह वह समय है जब प्रकृति दिल खोलकर उन्हें साल भर की रोजी-रोटी सौंप देती है।
आदिवासी अर्थव्यवस्था की सटीक लाइफलाइन
महुआ का फूल आदिवासियों के लिए केवल एक वनोपज नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक रीढ़ है। महुआ बेचकर ग्रामीणों को तुरंत नकद राशि प्राप्त होती है, जिससे वे शादी-ब्याह, बीमारी और साल भर के अन्य खर्चों का प्रबंधन करते हैं।
कबीरधाम जिले का महुआ अपनी उच्च गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों से लेकर औषधीय उपयोग और पारंपरिक निर्माण तक, इसकी भारी मांग रहती है। जिस दौर में खेती अनिश्चित होती है, महुआ आदिवासियों के लिए जीवन रेखा की तरह काम करता है। महुआ का सीजन शुरू होते ही ग्रामीणों में उत्साह का माहौल रहता है और पूरे परिवार के साथ महुआ फूल बीनते हैं।
टीम ने भोरमदेव क्षेत्र , चिल्फी , सरोधा ( उल्ट) सहित अन्य जगहों पर भी लोगों को महुआ एकत्रित करते देखा जहां वनांचल वासियों के चेहरे पर मुस्कान नजर आ रही थी पिला महुआ ही पिला सोना है ।
