यूजीसी के नए कानून के खिलाफ ब्राह्मण समाज का विरोध, कवर्धा कलेक्ट्रेट पहुंचकर सौंपा ज्ञापन, आंदोलन की चेतावनी

कवर्धा खबर योद्धा।। केंद्र सरकार द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अंतर्गत लागू किए गए नए कानून को लेकर असंतोष गहराता जा रहा है। इसी क्रम में कवर्धा जिले में ब्राह्मण समाज खुलकर सामने आया और यूजीसी के नए विनियम के विरोध में कलेक्ट्रेट कार्यालय पहुंचकर प्रशासन के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। समाज के पदाधिकारियों और सदस्यों ने इस कानून को सामान्य वर्ग के अधिकारों के प्रतिकूल बताते हुए इसे तत्काल निरस्त करने की मांग की है।

कलेक्ट्रेट पहुंचे समाजजन, शांतिपूर्ण ढंग से जताई आपत्ति
जिला ब्राह्मण समाज के बैनर तले बड़ी संख्या में समाजजन एकत्र हुए और कलेक्ट्रेट कार्यालय पहुंचकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। इस दौरान समाज के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी वर्ग के खिलाफ नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में संतुलन और न्याय की रक्षा के लिए है। ज्ञापन सौंपते समय पूरे कार्यक्रम में शांति और अनुशासन बनाए रखा गया।

कानून से असमानता बढ़ने का आरोप
ज्ञापन में कहा गया कि यूजीसी का नया कानून समानता और समता के उद्देश्य से लाया गया बताया जा रहा है, लेकिन इसकी संरचना ही असमानता को बढ़ावा देने वाली है। अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों को एक समूह में रखकर सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को अलग समूह में रखा जाना सामाजिक संतुलन को प्रभावित करता है। समाज का कहना है कि इस व्यवस्था से शिक्षा और अवसरों के क्षेत्र में असंतुलन पैदा होगा।

सामान्य वर्ग को स्वतः दोषी मानने की प्रवृत्ति पर आपत्ति
समाज के वक्ताओं ने आरोप लगाया कि नए विनियम में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को स्वतः ही उत्पीड़क या शोषणकर्ता मानने की मानसिकता झलकती है। धारा 3 में दी गई परिभाषाओं से यह संकेत मिलता है कि पीड़ित केवल एक वर्ग विशेष का व्यक्ति ही हो सकता है, जबकि सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के अधिकारों और संरक्षण का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया है।

समता समिति के गठन पर उठे सवाल
ज्ञापन में धारा 6 का विशेष उल्लेख करते हुए कहा गया कि समता समिति के गठन में एक वर्ग विशेष का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है, लेकिन सामान्य वर्ग के लिए कोई प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं किया गया। समाज ने इसे एकतरफा और भेदभावपूर्ण व्यवस्था बताया, जो निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।

धारा 11 से संस्थानों पर दबाव का आरोप
समाज ने धारा 11 के तहत अनुपालन न करने की स्थिति में शिक्षण संस्थानों पर कम समय में कार्रवाई का दबाव बनाए जाने पर भी आपत्ति जताई। कहा गया कि इस प्रावधान के कारण संस्थान बिना समुचित जांच और सुनवाई के जल्दबाजी में निर्णय लेने को विवश हो सकते हैं, जिससे न्यायसंगत प्रक्रिया प्रभावित होगी।

विद्यार्थी के लिए संरक्षण नहीं होने पर चिंता
ज्ञापन में सबसे गंभीर चिंता यह जताई गई कि जिस सामान्य वर्ग के विद्यार्थी पर आरोप लगेगा, उसके लिए किसी भी प्रकार के संरक्षण का प्रावधान नहीं है। आरोपित विद्यार्थी को ही अपने बचाव के लिए प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे, जबकि आरोप लगाने वाले पर कोई दायित्व नहीं डाला गया है। समाज ने इसे न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत बताया।
आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक बताया कानून
समाज के अनुसार देश में पहले से लागू विभिन्न आरक्षण संबंधी व्यवस्थाओं और सामाजिक न्याय के कानूनों के बावजूद सामान्य वर्ग ने संवैधानिक व्यवस्था का पालन किया है। लेकिन यह नया कानून आने वाली पीढ़ियों के लिए घातक सिद्ध हो सकता है और शिक्षा संस्थानों में भय तथा अविश्वास का माहौल बना सकता है।
आंदोलन की चेतावनी, पुनर्विचार की मांग
ज्ञापन के अंत में ब्राह्मण समाज ने स्पष्ट किया कि यदि इस कानून को वापस नहीं लिया गया तो मजबूरन आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा। समाज ने राष्ट्रपति से अपेक्षा जताई कि वे राष्ट्रप्रमुख के रूप में इस कानून पर तत्काल रोक लगाने और समतामूलक भारत के निर्माण के लिए कठोर निर्णय लेंगी।
