बरगद की जड़ों से रिसते पानी पर टिका जीवन: नवाटोला आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर

बरगद की जड़ों से रिसते पानी पर टिका जीवन: नवाटोला आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर

 

कवर्धा खबर योद्धा।। विकास और योजनाओं के दावों के बीच जिले का बिरहुलडीह आश्रित ग्राम नवाटोला आज भी उस सच्चाई को सामने लाता है, जहां जीवन की बुनियादी जरूरतें ही संघर्ष बन चुकी हैं। करीब डेढ़ सौ की आबादी वाला यह छोटा सा टोला आज भी पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। यहां न हैंडपंप है, न नलजल योजना की सुविधा और न ही गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क।

गांव की सुबह पानी की तलाश से शुरू होती है और दिन का बड़ा हिस्सा इसी जद्दोजहद में बीत जाता है। गर्मी का मौसम आते ही गांव के पास बहने वाला नाला सूख जाता है, जिससे ग्रामीणों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में लोग बरगद के पेड़ की जड़ों के नीचे मिट्टी खोदकर छोटी-सी झिरिया बनाते हैं और वहीं से बूंद-बूंद रिसते पानी को इकट्ठा कर पीने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

ग्रामीण सुकलाल बैगा बताते हैं कि उनके टोले में आज तक एक भी हैंडपंप नहीं लगाया गया। नाले का पानी ही वर्षों से सहारा रहा है, लेकिन जब वह भी सूख जाता है तो बरगद की जड़ ही जीवनरेखा बन जाती है। वहीं दुकालू बैगा का कहना है कि कई बार रोजाना करीब एक किलोमीटर दूर से पानी ढोकर लाना पड़ता है। गंदा पानी पीने के कारण पेट दर्द, बुखार और त्वचा रोग जैसी समस्याएं आम हो गई हैं, लेकिन ग्रामीणों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

 

स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। इलाज के लिए लोगों को चार किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है। ग्रामीण बुद्धसिंह बैगा बताते हैं कि दूरी भले ही सिर्फ चार किलोमीटर हो, लेकिन जंगल के भीतर कच्चा रास्ता होने के कारण यह सफर बेहद कठिन हो जाता है। बारिश में कीचड़ और गर्मी में धूल भरा रास्ता एंबुलेंस की पहुंच से बाहर रहता है। चतुर सिंह बैगा कहते हैं कि किसी की तबीयत खराब होने पर मरीज को खाट पर लादकर सड़क तक ले जाना पड़ता है, जिससे कई बार समय पर इलाज नहीं मिल पाता।

शिक्षा भी यहां संघर्ष का दूसरा नाम बन चुकी है। टोले में केवल प्राथमिक स्तर तक पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध है। आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। आवागमन की कठिनाई के कारण कई विद्यार्थी आश्रमों में रहने को मजबूर हैं, जबकि कुछ बच्चों ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी है। ग्रामीणों का मानना है कि यदि सड़क और पानी की सुविधा मिल जाए तो बच्चों का भविष्य बेहतर हो सकता है।

 

महिलाओं की परेशानी सबसे अधिक है। उनका कहना है कि सुबह से दोपहर तक का आधा समय सिर्फ पानी जुटाने में निकल जाता है। झिरिया से पानी भरने के लिए पहले मिट्टी हटानी पड़ती है, फिर पानी रिसने का इंतजार करना पड़ता है। इससे घर के कामकाज, बच्चों की देखभाल और आजीविका सभी प्रभावित होते हैं।

 

नवाटोला के ग्रामीणों की मांग साफ है—टोले में तत्काल हैंडपंप या नलजल योजना शुरू की जाए और मुख्य सड़क से गांव तक पक्की सड़क बनाई जाए। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पानी और रास्ते की सुविधा मिल जाए तो उनकी आधी परेशानियां खत्म हो जाएंगी। योजनाओं और विकास की चर्चाओं के बीच नवाटोला आज भी इंतजार कर रहा है उस दिन का, जब बरगद की जड़ों से रिसता पानी नहीं, बल्कि सरकारी सुविधाएं उनके जीवन का सहारा बनेंगी।

जितेन्द्र राज नामदेव

एडिटर इन चीफ - खबर योद्धा

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