कवर्धा में महाकाल की भव्य बारात, नर्सिंग रूप सहित अनेक झांकी ,गूंजा हर हर महादेव
शिव–गौरी विवाह ने रचा आस्था का नया इतिहास
कवर्धा खबर योद्धा।। महाशिवरात्रि पर इस बार कवर्धा ने सिर्फ पर्व नहीं मनाया, बल्कि आस्था का ऐसा दृश्य रचा जिसने धर्मनगरी की पहचान को और प्रखर कर दिया। दूल्हा बने महाकाल की भव्य बारात जब शहर की सड़कों पर उतरी तो हर गली, हर चौक शिवमय हो गया। काल भैरव की जीवंत और भव्य झांकी ने रैली को ऐसा केंद्र दिया कि श्रद्धालु देर तक उसी की चर्चा करते नजर आए।

आयोजन बाबा श्री महाकाल भक्त मंडल, कवर्धा के तत्वावधान में संपन्न हुआ। दोपहर में बूढ़ामहादेव मंदिर से महाभिषेक के साथ शुरुआत हुई। इसके बाद सजे-धजे रथ पर विराजित महाकाल दूल्हे के स्वरूप में निकले। ढोल-नगाड़ों, शंखध्वनि और जयघोष के बीच हजारों श्रद्धालु बारात में शामिल हुए। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में मंगलगीत गाती रहीं, जबकि युवाओं की टोलियां हर-हर महादेव के नारों से माहौल को ऊर्जावान करती रहीं।
काल भैरव की झांकी ने खींचा ध्यान
हरियाणा के सिरसा से आए कलाकारों द्वारा प्रस्तुत काल भैरव की झांकी इस बार की सबसे बड़ी आकर्षण रही। अघोरी स्वरूप, धधकते मशालों का दृश्य और भूत-प्रेतों की सजीव प्रस्तुति ने रैली को अलौकिक बना दिया। श्रद्धालु झांकी के साथ-साथ चलते रहे और मोबाइल कैमरों में इस दृश्य को कैद करते दिखे। बाहुबली हनुमान और भगवान नरसिंह की झांकियों ने भी रैली की भव्यता को बढ़ाया।

शिव–गौरी विवाह का दिव्य दृश्य
बारात जब भारत माता प्रतिमा प्रांगण पहुंची तो वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिव–गौरी विवाह की रस्में संपन्न कराई गईं। दीपों की पंक्तियां, फूलों की सजावट और भक्ति संगीत के बीच विवाह का दृश्य श्रद्धालुओं को भावविभोर कर गया। इसके बाद भस्म आरती में हजारों लोग शामिल हुए। आरती के समय वातावरण में ऐसी आध्यात्मिक ऊर्जा थी कि पूरा प्रांगण गूंज उठा।

51 किलो लड्डू का महाभोग
विवाह के अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती को 51 किलो के विशाल लड्डू का महाभोग अर्पित किया गया। बाद में यही प्रसाद श्रद्धालुओं में वितरित किया गया। देर रात तक लोग अनुशासित पंक्तियों में खड़े होकर प्रसाद ग्रहण करते रहे।
युवा प्रस्तुति और पर्यावरण संदेश
कार्यक्रम में युवा कलाकार सोनू निर्मलकर ने विशेष मंचन प्रस्तुत किया, जिसे श्रद्धालुओं ने खूब सराहा। आयोजन समिति ने इस बार पूरे कार्यक्रम को पर्यावरण संरक्षण से भी जोड़ा। सजावट और व्यवस्थाओं में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया गया।
रविवार की यह रात कवर्धा के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि सामूहिक उत्साह, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रतीक बन गई। महाकाल की बारात ने यह साबित कर दिया कि धर्मनगरी में आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जन-जन की धड़कन है।
