छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर पोला तिहार की रही धूम
पोला पर्व की रही धूम, ठेठरी और खुरमी की फैली खुशबू

झूमे बच्चे
मिट्टी के बैलों संग सजी गलियां, दो दिन तक छाया उत्सव का रंग
कवर्धा खबर योद्धा।। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर पोला पर्व इस वर्ष बरबसपुर और आसपास के ग्रामीण अंचलों में पूरे उल्लास और परंपरा के साथ दो दिन तक मनाया गया। बच्चों, किसानों और ग्रामीणों ने मिलकर इस पारंपरिक त्योहार को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया।

पहले दिन (22 अगस्त) गांव-गांव में मिट्टी से बने बैल, नंदी, दिया, चूल्हा, चुकीया और अन्य पारंपरिक खिलौनों की पूजा-अर्चना की गई। घरों में सुख-समृद्धि की कामना के साथ आरती उतारी गई । मिट्टी के बैलों का पूजा अर्चना कर ठेठरी-खुरमी का भोग लगाया गया।
बच्चों में दिखा उत्साह, मिट्टी के बैलों के संग की मस्ती
त्योहार के दूसरे दिन (23 अगस्त) गांव की गलियां रंग-बिरंगे मिट्टी के बैलों से सज गईं। बच्चों ने इन खिलौनों के साथ खेलते हुए पारंपरिक गीतों की धुन पर झूमकर त्योहार की रौनक बढ़ा दी। हर घर में पारंपरिक व्यंजन बने और पूरे गांव में मेले जैसा वातावरण रहा।

संस्कृति से जुड़ाव और परंपरा की सीख
गांव के बुजुर्गों का मानना है कि पोला पर्व केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि यह नई पीढ़ी को कृषि, पशुधन और प्रकृति के महत्व से जोड़ने का माध्यम भी है। यह पर्व बच्चों में संस्कृति के प्रति लगाव और जिम्मेदारी की भावना पैदा करता है।

बरबसपुर में गूंजते पारंपरिक गीत, बच्चों की खिलखिलाहट और मिट्टी की सोंधी खुशबू ने इस वर्ष के पोला पर्व को अविस्मरणीय बना दिया।

