मैकल पर्वत श्रृंखला से 121 फीट नीचे गिर रहा पानी, दूर तक गूंजती है झरने की आवाज मानसून में जीवंत हुआ मांदाघाट जलप्रपात, सफेद धाराओं और प्राकृतिक खूबसूरती से लोगों का मोह रहा मन

मैकल पर्वत श्रृंखला से 121 फीट नीचे गिर रहा पानी, दूर तक गूंजती है झरने की आवाज

मानसून में जीवंत हुआ मांदाघाट जलप्रपात, सफेद धाराओं और प्राकृतिक खूबसूरती से लोगों का मोह रहा मन

कवर्धा खबर योद्धा।। मानसून की बारिश के साथ ही मैकल पर्वत श्रृंखला का मांदाघाट एक बार फिर सफेद जलधाराओं से जीवंत हो उठा है। घने जंगल, ऊंची-नीची पहाड़ियां और चट्टानों के बीच करीब 121 फीट की ऊंचाई से गिरता जलप्रपात इन दिनों प्रकृति प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पहाड़ की ऊंचाई से तेज रफ्तार में नीचे गिरते पानी की आवाज काफी दूर तक सुनाई देती है, वहीं चट्टानों से टकराकर बिखरती पानी की बूंदें इस पूरे क्षेत्र की खूबसूरती को और बढ़ा देती हैं।

कवर्धा जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर सरोदा-रेंगाखार मार्ग पर भोरमदेव अभयारण्य क्षेत्र में स्थित मांदाघाट मानसून के दौरान खास तौर पर आकर्षक नजर आता है। बारिश शुरू होते ही यहां पहाड़ों से निकलने वाली जलधाराएं तेज हो जाती हैं और सूखे मौसम में शांत नजर आने वाला यह क्षेत्र झरनों की आवाज से गूंजने लगता है।

एक नहीं, तीन बरसाती झरने

मांदाघाट की खासियत यह है कि यहां एक नहीं बल्कि तीन बरसाती झरने दिखाई देते हैं। इनमें से दो झरनों तक अपेक्षाकृत आसानी से पहुंचा जा सकता है, लेकिन करीब 121 फीट ऊंचे मुख्य जलप्रपात तक पहुंचने के लिए फिलहाल कोई सुरक्षित रास्ता नहीं है। ऊंची चट्टानों और दुर्गम पहाड़ी भू-भाग के कारण मुख्य झरने के करीब जाना जोखिम भरा हो सकता है।

मानसून के दौरान चट्टानों पर काई और फिसलन बढ़ जाती है। इसके अलावा जलप्रपात में पानी का बहाव भी तेज रहता है। ऐसे में रोमांच के लिए मुख्य जलधारा के बेहद करीब जाना हादसे का कारण बन सकता है। प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेते समय पर्यटकों को सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।

पहाड़ी रास्तों से होकर पहुंचते हैं मांदाघाट

मांदाघाट पहुंचने के लिए कवर्धा से सरोदा बांध की दिशा में जाना पड़ता है। इसके बाद बांधा बैरियर के पास निर्धारित प्रक्रिया के तहत एंट्री पास लेकर आगे बढ़ा जा सकता है। यहां से घुमावदार और पहाड़ी रास्तों से होकर मांदाघाट क्षेत्र तक पहुंचा जाता है।

बारिश के दिनों में पहाड़ी रास्ते और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं। कई स्थानों पर सड़क के किनारे घना जंगल और दूसरी ओर ढलान होने के कारण वाहन चलाते समय सावधानी बरतनी पड़ती है। यही वजह है कि मांदाघाट पहुंचने वाले लोगों को मौसम और रास्ते की स्थिति को ध्यान में रखकर ही यात्रा करने की सलाह दी जाती है।

प्रकृति के बीच सुकून का एहसास

मांदाघाट की सबसे बड़ी खूबसूरती इसका प्राकृतिक और शांत वातावरण है। चारों ओर फैली हरियाली, बादलों से ढकी पहाड़ियां और चट्टानों के बीच बहती जलधाराएं यहां आने वाले लोगों को कुछ समय के लिए शहर की भागदौड़ से दूर कर देती हैं। ऊंचाई से गिरते पानी की लगातार गूंज और आसपास का प्राकृतिक वातावरण लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

मानसून के दौरान यहां का दृश्य किसी प्राकृतिक चित्र की तरह नजर आता है। पहाड़ों से गिरती सफेद धाराएं दूर से ही दिखाई देने लगती हैं। यही वजह है कि बारिश के मौसम में मांदाघाट की खूबसूरती देखने के लिए स्थानीय लोग और प्रकृति प्रेमी यहां पहुंचते हैं।

पर्यटन की संभावनाएं, लेकिन सुरक्षा जरूरी

मांदाघाट में प्राकृतिक पर्यटन की अच्छी संभावनाएं मौजूद हैं। हालांकि मुख्य जलप्रपात तक पहुंचने के लिए सुरक्षित मार्ग का अभाव और मानसून में बढ़ता जलस्तर इसे संवेदनशील क्षेत्र भी बनाता है। ऐसे में पर्यटकों की सुविधा के साथ सुरक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान देना जरूरी है।

मांदाघाट जैसे प्राकृतिक स्थलों को विकसित करते समय पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए सुरक्षित पहुंच मार्ग, आवश्यक चेतावनी बोर्ड और निगरानी व्यवस्था विकसित की जाए तो यह क्षेत्र जिले के प्रमुख प्राकृतिक पर्यटन स्थलों में अपनी पहचान बना सकता है।

जितेन्द्र राज नामदेव

एडिटर इन चीफ - खबर योद्धा

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