पर्यवेक्षकों के सेक्टर परिवर्तन का अधिकार फिर कलेक्टरों को, नए आदेश से कर्मचारियों में चर्चा तेज
रायपुर खबर योद्धा विद्या भूषण दुबे।। महिला एवं बाल विकास विभाग (मबाविवि) एक बार फिर अपने प्रशासनिक आदेश को लेकर चर्चा में है। शासन द्वारा 9 जून 2026 को जारी आदेश के तहत जिला कलेक्टरों को पर्यवेक्षकों के सेक्टर परिवर्तन तथा संबंधित विवादों के निराकरण का अधिकार प्रदान किया गया है। इस फैसले के बाद विभागीय कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच नई बहस शुरू हो गई है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार यह आदेश विभागीय कार्यों के सुचारू संचालन, प्रशासनिक कसावट और क्षेत्रीय स्तर पर उत्पन्न होने वाले विवादों के त्वरित समाधान को ध्यान में रखकर जारी किया गया है। नए आदेश के बाद उन कर्मचारियों के दावों पर भी सवाल उठने लगे हैं जो अब तक यह कहते रहे हैं कि कलेक्टर को सेक्टर परिवर्तन का अधिकार प्राप्त नहीं है।

जानकारों का कहना है कि इस आदेश से कलेक्टरों की प्रशासनिक भूमिका और अधिक मजबूत हुई है। कर्मचारी संघों की ओर से पूर्व में गोपनीय प्रतिवेदन (सीआर) के तीसरे मतांकन में कलेक्टर की भूमिका समाप्त करने की मांग की गई थी, लेकिन शासन ने उस दिशा में कदम बढ़ाने के बजाय पर्यवेक्षकों से जुड़े मामलों में कलेक्टरों को और अधिक अधिकार प्रदान कर दिए हैं।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले 16 फरवरी 2012 को भी कलेक्टरों को पर्यवेक्षकों के सेक्टर परिवर्तन के लिए प्राधिकृत किया गया था। बाद में लगभग सात वर्ष पश्चात 6 अगस्त 2019 को उक्त व्यवस्था को स्थगित कर दिया गया था। अब वर्ष 2026 में शासन ने पुनः यह अधिकार जिला कलेक्टरों को सौंप दिया है।

गोपनीय प्रतिवेदन व्यवस्था के इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2013 से पहले पर्यवेक्षकों के सीआर में केवल परियोजना अधिकारी और जिला कार्यक्रम अधिकारी के हस्ताक्षर होते थे। इसके बाद 28 अक्टूबर 2013 को तत्कालीन संचालक दिलीप वासनीकर द्वारा मतांकन एवं संधारण संबंधी आदेश जारी किया गया था। वहीं 18 मार्च 2021 को तत्कालीन संचालक दिव्या मिश्रा ने गोपनीय प्रतिवेदन के संबंध में विस्तृत और सारगर्भित दिशा-निर्देश जारी किए थे। उस समय लिपिक वर्ग के कर्मचारियों के गोपनीय प्रतिवेदन में भी कलेक्टर का तीसरा मतांकन शामिल होता था।
नए आदेश और उसके प्रावधानों को लेकर कर्मचारी जगत में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। विभागीय हलकों में इसे प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने वाला कदम बताया जा रहा है, जबकि कुछ कर्मचारी संगठन इस पर अपनी अलग राय रखते हैं। विभिन्न कर्मचारी संघों के पदाधिकारियों से इस संबंध में प्रतिक्रियाएं आमंत्रित की गई हैं।


